Hastmaithun Se Pareshan Hain To Karen Ye Upay

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हस्तमैथुन से परेशान हैं तो करें ये उपाय

हस्मैथुन(Masturbation)

हस्तमैथुन कोई रोग नहीं, बल्कि यह एक बहुत ही घृणित और बुरी आदत है, जिसमें मनुष्य अपने वीर्य को हाथों या जांघों की रगड़ से या कोमल वस्त्र, स्पंज, चमड़े और रबड़ की थैलियों द्वारा या तकिये की रगड़ से निकाल लेता है। इसके अतिरिक्त इस बुरे और घृणित काम के लिए और भी बहुत से अस्वाभाविक उपाय अपनाये जाते हैं, जिससे युवक अपने शरीर और अपने वीर्य का नाश करते हैं।

हस्तमैथुन के कारण-

1. एकांत में रहना

2. कामवासना की अधिकता

3. बुरे विचार

4. नग्न चित्र देखना

5. बुरी संगत

6. सिनेमा और संभोग प्रिय गंदी स्त्री के सम्पर्क में रहना आदि, जिनसे इस ‘काय’ की आदत पड़ जाती है, क्योंकि मनुष्य अपनी कामवासनाओं को पूर्ण करने के उद्देश्य से विवश होकर इस घृणित विधि में फंस जाता है।

7. पेट के कीडे़, मूत्राशय की पथरी, सुपारी के मांस का लंबा और संकीर्ण होना तथा सुपारी पर मैल जम जाना आदि भी ऐसे कारण हैं, जिनसे इन्द्री में खराश और गुदगुदी उत्पन्न होकर हस्तमैथुन की आदत पड़ जाती है।

हस्तमैथुन के परिणाम-

हस्तमैथुन करने की लत के कारण अपूर्ण या कच्ची मैथुन की इच्छा की अधिकता, स्वप्नदोष, वीर्य प्रमेह, शीघ्रपतन, नामर्दी, इन्द्री शिथिल, छोटी, टेढ़ी और कमजोर हो जाना आदि रोग हो जाते हैं।

हस्तमैथुन के लक्षण-

रोगी हताश, साहसहीन, उदास, व्यवसाय से घृणा करने वाला, एकांत का इच्छुक, चिड़चिड़ा और डरपोक हो जाता है। उसकी आंखों के चारों ओर काले गड्ढे पड़ जाते हैं। कब्ज़, हृदय अधिक धड़कना, रक्त की कमी, पाचन विकार, पुराना नज़ला, भूल जाना, स्नायु दुर्बलता जैसे रोग जाते हैं। दिल, दिमाग, जिगर, फेफड़े आंतें और मूत्राशय आदि कमजोर हो जाते हैं। रोगी लज्जा के कारण लोगों से आंखें नहीं मिला सकता। रोगी मूत्र करते समय जलन और गुदगुदी-सी प्रतीत करता है। रोगी की रीढ़ ही हड्डी पर चीटियां रेंगती प्रतीत होती हैं, कमर में दर्द रहता है, हथेलियों और तलवों में जलन प्रतीत होती है और ठंडा पसीना आता है। एकाग्रता शक्ति घट जाती है, दृष्टि कमजोर हो जाती है, चेहरा पीला और गाल पिचके हुए हो जाते हैं। शिश्न में बहुत खराबी आ जाती है और उसकी जड़ कमजोर और पतली हो जाती है। इन्द्री ढीली-ढाली और साधारण से छोटी हो जाती है और अधिकतर किसी एक ओर को टेढ़ी हो जाती है। इसकी शिरायें फूल जाती हैं और इसकी संवेदनात्मक संज्ञा बहुत बढ़ जाती है। अंत में नपुंसकता उत्पन्न हो जाती है।

हस्तमैथुन की आयुर्वेदिक चिकित्सा-

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1. मीठी निर्बसी, शुद्ध शिलाजीत, असगंध नागौरी, कौंच के बीजों की गिरी, शतावरी, सालब मिश्री प्रत्येक 6 ग्राम, अकरकरा, बढ़िया लोह भस्म, दालचीनी, लौंग, एक्सट्रैक्ट नक्स वाॅमिका, असली सिद्ध मकरध्वज, विशुद्ध केसर प्रत्येक 3 ग्राम, योहिम्बीन हाइड्रोक्लोराइड, मस्क(कस्तूरी) प्रत्येक 1 ग्राम, एक्सट्रैक्ट डमियाना 6 ग्राम।
इन सबको भली-भांति खरल करें। फिर आवश्यकतानुसार मुर्गी के अण्डे की जर्दी में खूब घोंटकर चने के बराबर गोलियां बना लें और गोलियों पर चांदी के वर्क चढ़ा लें। 1 से 2 गोली तक सहन-शक्ति के अनुसार सुबह-शाम गाय के दूध के साथ खिलायें। ये गोलियां मर्दाना शक्ति उत्पन्न करने में अद्वितीय हैं। दुर्बल व्यक्तियों को नया जीवन प्रदान करती हैं। गये गुजरे नवयुवकों और बूढ़ों में फिर से नई उमंग और नया जोश उत्पन्न कर देती हैं। शरीर में रक्त की मात्रा बढ़ाती हैं और स्नायु को शक्ति पहुंचाती है। नपुंसकता, मर्दाना कमजोरी की शर्तिया सफल चिकित्सा है।

2. सूर्यतापी शुद्ध शिलाजीत 6 ग्राम, एक्सट्रैक्ट नक्स वाॅमिका, प्रवाल भस्म, लोह भस्म शतपुटी, विशुद्ध केसर प्रत्येक 3 ग्राम, एक्सट्रैक्ट डमियाना 6 ग्राम, योहिम्बीन हाइड्रोक्लोराइड, मकरध्वज प्रत्येक डेढ़ ग्राम, कस्तूरी 720 मि.ग्रा.।
इन सबको भली-भांति खरल करके शहद से चने के बराबर गोलियां बना लें। 1-1 गोली सुबह-शाम गाय के दूध साथ रोगी को खिलायें। अधिक शुष्की प्रतीत हो तो मक्खन या मलाई के साथ खिलाये। शिश्न में उत्तेजना और उत्थान या हर्षण(एरेक्शन) उत्पन्न करना, इन गोलियांे की विशेषता है। इनके प्रयोग से शारीरिक शक्ति बढ़ जाती है। ये गोलियां तांत्रिक दुर्बलता को दूर करती है और शरीर में जवानी का जोश भर देती हैं।

3. स्ट्रिकनीन हाइड्रोक्लोराइड 1 ग्राम, मुर्गी के अण्डे की जर्दी का तेल, मालकंगनी का तेल, दालचीनी का तेल(आॅयल सेनेमन), लौंग का तेल(आॅयल क्लोव्ज) प्रत्येक 6 ग्राम मिलाकर दो घण्टे तक खरल करके रख लें। इस तिले को इन्द्री पर मलें। पान आदि बांधने की कोई आवश्यकता नहीं। परन्तु यदि बांध दिया जाये तो अधिक अच्छा है। इसके प्रयोग से इन्द्री की सुस्ती, कमजोरी, ढीलापन, संभोग करते समय जोश न आना आदि तमाम दोष दूर हो जाते हैं।

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4. शुद्ध सफेद सखिया 3 ग्राम, चांदी के वर्क 9 ग्राम। दोनों को इतना खरल करें कि मैदे की भांति बारीक हो जाये। इसमें खांड 48 ग्राम मिलाकर 8 घंटे तक खरल करके रख लें। 125 मि.ग्रा. यह चूर्ण सुबह नाश्ते के बाद ताजा मक्खन या मलाई में लपेट कर खिलायें और एक घण्टे बाद डेढ़ लिटर दूध पी लिया करें। जवान बनाने वाली बहुत सफल दवा है यह। इसके प्रयोग से शारीरिक और स्नायु दुर्बलता दूर हो जाती है तथा इन्द्री में सख्ती उत्पन्न हो जाती है।

5. सफेद संखिया 12 ग्राम, गाय का घी 250 ग्राम, दोनों को एक सप्ताह तक निरंतर खरल करें। फिर उसे चीनी की प्लेट में डालकर प्लेट को थोड़ा टेढ़ा करके धूप में रखें। जब साफ तेल निथर जाये, तो से शीशी में डाल लें। प्रतिदिन रात को सोते समय इन्द्री पर इस तेल की मालिश करायें। परन्तु सुपारी और सीवन को बचायें, इसके ऊपर बंगला पान गर्म करके बंधवायें। यह तेल इन्द्री के बाहरी दोषों को दूर करता है और उसको शक्तिशाली बना देता है। यह तेल 250 मि.ग्रा. की मात्रा में मक्खन, मलाई या शुद्ध देसी घी के हलवा में मिलाकर खिलाया भी जा सकता है।

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6. पारा 2 ग्राम, शुद्ध हींग 4 ग्राम, शहद 18 ग्राम। पहले हिंग को भली-भांति खरल करें, फिर पारा मिलाकर खूब घोंटे, यहां तक कि दोनों एक समान हो जायें। फिर थोड़ा-थोड़ा शहद मिलाकर खरल करते रहें, यहां तक कि सारा शहद मिल जाये। खरल इतना अधिक करें कि पारे की चमक बिल्कुल न रहे। डेढ़ चम्मच इन्द्री पर लेप करके पान का पत्ता बांध दें।

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7. प्याज को कूटकर आधा किलो रस निकालें। इसको किसी कलई किये हुए बर्तन में डालकर शहद 250 ग्राम मिलाकर धीमी आग पर पकायें। जब प्याज का रस जल जाये और केवल शहद ही रह जाये, तो आग से उतार कर सफेद मूसली का चूर्ण 125 ग्राम मिलाकर घोंटकर शीशी में रख लें। 6 से 12 ग्राम सुबह-शाम रोगी को खिलायें। नपुंसकता, हस्तचलन से उत्पन्न विकारों और मर्दाना कमजोरी के रोगियों के लिए अमृततुल्य है।

सूचना- हस्तमैथुन करने वाले व्यक्ति को आरम्भ में हर प्रकार की गर्म, शुष्क तथा उत्तेजक वस्तुओं जैसे अण्डे, चाय, काॅफी, गर्म मसाला, देर में पचने वाली वस्तुएं और वातवर्धक वस्तुओं से परहेज करायें। हल्का और सादा भोजन जैसे- कद्दू, पालक, तोरई और शलजम आदि खिलायें। जब इन्द्री के दोष दूर हो जायें, स्वप्नदोष और वीर्य प्रमेह भी देर हो जाये और पाचन क्रिया सुधर जाये, तो शारीरिक दुर्बलता दूर करने और मर्दाना शक्ति बढ़ाने के लिए अण्डे, मांस, घी, मक्खन, मलाई, मछली और गिरियां आदि खिलायें। परन्तु देर से पचने वाली वातवर्धक और खट्टी वस्तुएं बिल्कुल न खिलायें।

वैद्यक चिकित्सा- सबसे पहले हस्तचलन की आदत छुड़ायें, क्योंकि जब तक रोगी इस आदत को नहीं छोड़ेगा, तब तक उसकी चिकित्सा व्यर्थ है।

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